एफआरडीआई बिल को संसद द्वारा मंजूरी मिल गई तो इसमें इसकी क्षमता है कि यह हमारी जमा रकमों (डिपॉजिट्स), बैंकिंग व्यवस्था और इस देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकता है।

अगर आपका बैंक, डूबे हुए कर्जों के बोझ के कारण असफल होकर डूबने के कगार पर हो तो बेल-इन के प्रावधान के तहत, बैंक में बीमे की सीमा से ऊपर जमा आपकी रकम इक्विटी (शेयर) में बदल जाएगी और आप सहमति से या इसके बिना, शेयरहोल्डर बना दिए जा सकते हैं।

बिल में बीमित राशि को परिभाषित नहीं किया गया है। इस बिल के पारित होते ही मौजूदा एक लाख का बीमा खत्म हो जाएगा।

अगर आपका बैंक छोटा है और इसके ऊपर अधिक डूबे हुए कर्जों (या नन परफॉर्मिंग असेट्स यानी एनपीए) का बोझ है तो बिल को इसका अधिकार होगा कि यह आपके बैंक की परिसंपत्तियों को बेच दे और इसे सालभर के लिए एक अस्थायी संस्थान (ब्रिज सेवा प्रदाता) के हवाले कर दे, किसी और बैंक में इसका विलय कर दे या बैंक को बंद (लिक्विडेट) कर दे।

बिल, रेजॉल्युशन कॉरपोरेशन (आरसी) को इसके अधिकार सौंपता है, जो आपकी जमा रकमों (डिपॉजिट्स) की किस्मत का फैसला करेगा। अगर आपका बैंक, बिल की परिभाषा के मुताबिक फौरी या गंभीर जोखिम वाला है, तो आरसी के आगे रिजर्व बैंक की भी कोई ताकत नहीं रहेगी।

करदाताओं के पैसे की सुरक्षा के नाम पर सरकार खुद करदाताओं से ही कह रही है कि बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा अपने कर्जे अदा कर पाने में नाकाम रहने की वे कीमत चुकाएं।

इस देश की आम जनता नोटबंदी (विमुद्रीकरण), जीएसटी, बढ़ती बेरोजगारी और कम रोजगार का दंश झेलती आई है, जबकि धनी और ताकतवर लोग करों में छूट और अपने कर्जों की माफी के मजे उठाते रहे हैं। यह बिल खुलेआम यह कह रहा है कि धनी और ताकतवर लोगों की गलतियों की कीमत गरीब लोग चुकाएं।

बिल और इसके प्रभावों के बारे में और अधिक यहां पढ़ें। यहां क्लिक करे

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